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Premchand Biography – मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय

Premchand Biography - मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय
Written by Abhilash kumar

मुंशी प्रेमचंद (Premchand) हिंदी साहित्य में एक बहुत ही जाना माना और बड़ा नाम है भारत में लगभग जिन्होंने हिंदी पड़ी है, वे सब मुंशी प्रेमचंद जी के बारे में अच्छे से जानते हैं। जब भी हम हिंदी साहित्य की बात करते है तो मुंशी प्रेमचंद जी का नाम सबसे ऊपर आता है। मुंशी प्रेमचन्द जी ने अनेकों उपन्यास, कहानियां, नाटक हिंदी व उर्दू में लिखे हैं। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियां, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें और हजारों पृष्ठ के लेख, सम्पादकीय, व्याख्यान, भूमिका, पत्र आदि की रचना की थी। तो आज हम आपको उन्हीं महान मुंशी प्रेमचंद जी के बारे में आपको बताएंगे।

Premchand Biography in hindi

जन्म (Birth)

मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई 1880 को देव भूमि वाराणसी उत्तर प्रदेश के नजदीक एक छोटे से गावं लमही में हुआ था। मुंशी प्रेमचंद जी का असली नाम धनपत राय था। उनके पिता का नाम मुंशी अजायव राय था। मुंशी प्रेमचंद केवल 8 वर्ष के थे तो उनकी माता की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके पिताजी ने दूसरी शादी कर ली। प्रेमचंद जी जब 15 साल के हुए तब उनके पिताजी ने उनका विवाह कर दिया। उनके विवाह के 1 या 2 साल बाद उनके पिता की भी मृत्यु हो गई इसके बाद से परिवार की पूरी जिम्मेदारी प्रेमचंद जी पर ही आ गई। सौतेली मां का व्यवहार भी मुंशी प्रेमचंद जी के साथ कुछ ठीक नहीं था।

बचपन से ही प्रेमचंद जी को पढ़ने लिखने का बहुत शौक था और मात्र 13 साल की उम्र में ही उन्होंने काफी कहानियां लिखना शुरु कर दी थी। प्रेमचंद जी का शुरुआती जीवन बेहद कठिनाइयों में गुजरा उन्होंने 16 साल की खेलने वाली उम्र में ही गरीबी से लेकर सौतेली मां के व्यवहार जैसी सब चीजें देख ली थी। उनकी पहली शादी भी ज्यादा दिन नहीं चली और आपसी कलह की वजह से वह भी टूट गई। उनका दूसरा विवाह शिवरानी देवी से हुआ जिनसे उनको तीन संतानें हुईं।

कलयुग का भीम

शिक्षा (Education)

मुंशी प्रेमचंद जी की शुरुआती पढ़ाई बेहद कठिनाइयों से हुई घर के हालात ठीक ना होने की वजह से वह पैदल ही बनारस पढ़ने जाते थे। हिंदी के अलावा उन्हें उर्दू से बेहद लगाव था। इसलिए उनकी शुरुआती कहानियां उर्दू में ही है। 1898 में प्रेमचंद जी ने मैट्रिक की परीक्षा पास की। मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद ही उन्होंने एक स्थानीय कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया और उसी के साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी।
1910 में अंग्रेज़ी, दर्शन, फ़ारसी और इतिहास लेकर इंटर किया और 1919 में अंग्रेज़ी, फ़ारसी और इतिहास लेकर बी. ए. किया।

प्रेमचंद जी की रचनाएँ

प्रेमचंद जी ने अनेक उपन्यास कहानियां एवं नाटक लिखें उनकी कहानियां एवं उपन्यास आज भी लगभग 100 साल बाद इस जमाने में बिल्कुल सटीक बैठते हैं। उनके लिखने का तरीका बहुत निराला था। हिंदी के साथ उर्दू का ऐसा इस्तेमाल करते थे की पढ़ने वाला कहानियों में बिल्कुल खो जाता था।

प्रेमचंद जी का पहला उपन्यास ‘असरारे मआबिद उर्फ़ देवस्थान रहस्य’ था। यह उपन्यास वर्ष 1903-1905 में प्रकाशित हुआ। प्रेमचंद जी के बाकी के कुछ प्रसिद्ध उपन्यास इस प्रकार हैं –

  • सेवासदन
  • प्रेमाश्रम
  • रंगभूमि
  • निर्मला
  • कायाकल्प
  • गबन
  • कर्मभूमि
  • गोदान
  • मंगलसूत्र 
Premchand Biography - मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय

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इसके अलावा मुंशी प्रेमचंद जी ने तीन और नाटक भी लिखें हैं जो इस प्रकार हैं –

  • संग्राम – 1923
  • कर्बला – 1924
  • प्रेम की वेदी – 1933

मुंशी प्रेमचंद जी ने अनेकों कहानियां भी लिखी है जिनके किरदार आज भी लोगों को लोगों के जहन में बसे हुए हैं क्योंकि उनकी कहानियों के किरदार मन में गड़े हुए नहीं होते थे, बल्कि उन्हीं के आसपास के लोग थे।

  • गुल्‍ली डंडा
  • ईदगाह
  • दो बैलों की कथा
  • पंच परमेश्‍वर
  • पूस की रात
  • ठाकुर का कुआँ
  • बूढ़ी काकी
  • दूध का दाम
  • कफन

इनमें से काफी कहानियां आपने अपने पाठ्यक्रम की पुस्तकों में पढ़ी होंगी। जैसे दो बैलों की कथा बताती है कि किस तरह दो बैल अपने मालिक से अलग नहीं रह पाते हैं। और उनकी कहानी ‘कफन’ मजदूर और उसकी व्यथा के बारे में बहुत ही अच्छे से बताती है।

मुंशी प्रेमचंद ने अपने लेख से भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने अपने लेखों के जरिए लोगों में अपनेपन की उमंग को बखूबी जगाए रखा। उन्होंने कई लेख अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भी लिखे।

मुंशी प्रेमचंद जी की कहानियाँ एवं उपन्यास इतने सत्य और इतने प्रैक्टिकल थे कि ना जाने उन पर कितनी फिल्में और कितने धारावाहिक बन चुके हैं। उनके उपन्यास एवं कहानियों से फिल्मकार ने करोड़ों रुपये बनाए हैं। प्रेमचंद का संघर्ष केवल किताबो में ही नही उनकी रचनाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी नोजवानो की प्रेरणा बनी रही है और उनकी रचना के पात्र अब मूर्तियों की शक्ल भी ले चुके हैं।

निधन (Death Of Munshi Premchand)

वह अपने अंतिम दिनों में इलाहाबाद रहना चाहते थे जहां पर उनके बेटे पढ़ाई भी कर रहे थे। वहाँ आकर उनकी सेहत गिरने लगी। 8 अक्टूबर 1936 को मुंशी जी का निधन हो गया। उनके देहांत साथ ही एक साहित्यिक युग का अंत हुआ। आज भी मुंशी प्रेमचंद जी की कहानियां एवं उपन्यास लोग बड़े मन से पढ़ते हैं,क्योंकि वह सिर्फ कहानियां एवं उपन्यास ही नहीं थे, लोगों की भावनाएं उनसे जुड़ी हुई थी। आने वाली पीढ़ियों में भी यूं ही मुंशी जी का नाम हमेशा के लिए अमर रहेगा।

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Abhilash kumar

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