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मौर्य वंश का इतिहास क्या है ?

मौर्य वंश का इतिहास
Written by Abhilash kumar
मौर्य वंश का इतिहास क्या है

भारतवर्ष अपने अंदर न जाने कितने बड़े बड़े इतिहास को समेटे हुआ है. हमारा देश सभी धर्मों एवं सभी जातियों के इतिहास ओं के बारे में भी प्रसिद्ध है. हमारा भारतवर्ष न जाने कितने अनगिनत जातियों एवं धर्मों के सभ्यताओं के लिए भी जाना जाता है. हमारे हिंदुस्तान में बड़ी-बड़ी सभ्यताओं का उदय हुआ है.

आज हम भारतवर्ष में सबसे बड़े एवं लंबे समय तक चले शासन काल के बारे में आप लोगों को बताने वाले हैं. क्या आपने कभी मौर्य वंश के इतिहास के बारे में सुना है ? ज्यादातर छात्रों के लिए इस प्रश्न का उत्तर जानना बहुत ही आवश्यक है. छात्रों के लिए इस विषय में जानना इसलिए आवश्यक है क्योंकि , यह प्रश्न कई प्रतियोगिता परीक्षाओं में पूछा जाता है. चलिए इस लेख के माध्यम से जान लेते हैं, कि मौर्य वंश का इतिहास कैसा रहा है ?

मौर्य वंश के बारे में संक्षिप्त जानकारी ?


मौर्य वंश का प्रशासन काल 322-185 ईसा पूर्व तक चला था. प्राचीन काल के भारतवर्ष में यह राखी 137 वर्षों तक का था. भारतवर्ष में मौर्य राजवंश की स्थापना सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने किया था. मौर्य राजवंश का उदय सम्राट चंद्रगुप्त और आचार्य चाणक्य  (यानी कि कौटिल्य) के बल पर ही संभव हो पाया था. सम्राट अशोक ने नंद वंश को खंडित किया, जिसमें सम्राट घनानंद पराजित हुए थे. इसके पश्चात ही मौर्य राजवंश का उदय हुआ था. मौर्य राजवंश का साम्राज्य मगध राज्य से गंगा नदी के मैदानों से होते हुए आरंभ हुआ था. मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी.

मौर्य वंश की स्थापना कब हुई ?


सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने मंत्री आचार्य चाणक्य के साथ मिलकर अपनी सैन्य शक्ति को बहुत ही ताकतवर किया और 322 ईसा पूर्व को नंद वंश का पतन करके मौर्य राजवंश का अस्तित्व स्थापित किया. उस समय काल में गुप्त चरो के द्वारा यह पता लगाया गया, कि किन-किन छोटे एवं बड़े राजाओं में आपसी मतभेद छिड़े हुए हैं. 

यह छोटे-छोटे आपसी मतभेद छोटे बड़े राजाओं में सिकंदर के आक्रमण के बाद प्रारंभ हुए थे और इन्हीं छोटे-छोटे मतभेदों का फायदा सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और उनके मंत्री आचार्य चाणक्य जी ने पूरी चतुरता के साथ सही तरीके से फायदा उठाया. 

इसी समय चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने गुप्तचरो (जासूसों) का एक विस्तृत जाल बिछा दिया. चंद्रगुप्त मौर्य इन्हीं जासूसों की सहायता से यूनानीयों को अपने देश से मार भगाया था. चंद्रगुप्त मौर्य ने सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस को लगभग 305 ईसा पूर्व के आसपास में पराजित किया था. 

मौर्य राजवंश के इतिहास में यह भी कहा जाता है, कि सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की लड़की का विवाह चंद्रगुप्त मौर्य से हुआ था. मेगास्थनीज चंद्रगुप्त के दरबार में आया था. हम आपको बता दें, कि चंद्रगुप्त मौर्य की माता का नाम “मुरा” था, इसीलिए यह वंश “मौर्य वंश” भी कहलाता है. सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने बहुत ही तीव्रता से पश्चिम की तरफ अपने साम्राज्य का विस्तार भी किया था.

मौर्य वंश का इतिहास| maurya vans in hindi| samrat ashok

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सम्राट अशोक मौर्य के द्वारा मौर्य वंश का विस्तार ?


चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल के बाद उनके पुत्र बिंदुसार ने 298 ईसा पूर्व से 273 ईसा पूर्व तक मौर्य साम्राज्य का विस्तार एवं इस पर राज्य किया था. बिंदुसार के शासनकाल के बाद 273 ईसा पूर्व में उनके पुत्र अशोक ने 232 ईसा पूर्व तक मौर्य वंश की गद्दी पर सफलतापूर्वक मौर्य वंश का शासन बनाए रखा. 

सम्राट अशोक के शासनकाल में मौर्य वंश का बहुत ही बेहतर तरीके से विस्तार हुआ. इतना ही नहीं 316 ईसा पूर्व होने तक मौर्य साम्राज्य ने अपने शासनकाल को पूरे उत्तरी पश्चिम भारत पर स्थापित किया था. इतिहास से पता चलता है कि सम्राट अशोक के समय में कलिंग का भारी नरसंहार हुआ था और इसी के वजह से कलिंग ने बौद्ध धर्म को स्वीकार भी कर लिया था.

मौर्य वंश का शासन काल एवं मौर्य सम्राटों का विवरण ?


नीचे हमने एक सूची बनाई हुई है जिसमें आप मौर्य साम्राज्य का शासनकाल विवरण एवं उनके सम्राटों का समय काल भी दिया हुआ है, जो निम्नलिखित है.

क्रं. सं. शासक शासन काल
चन्द्रगुप्त मौर्य 322 ईसा पूर्व- 298 ईसा पूर्व
बिन्दुसार 298 ईसा पूर्व –272 ईसा पूर्व
अशोक 273 ईसा पूर्व –232 ईसा पूर्व
दशरथ मौर्य 232 ईसा पूर्व- 224 ईसा पूर्व
सम्प्रति 224 ईसा पूर्व- 215 ईसा पूर्व
शालिसुक 215 ईसा पूर्व- 202 ईसा पूर्व
देववर्मन 202 ईसा पूर्व –195 ईसा पूर्व
शतधन्वन मौर्य 195 ईसा पूर्व 187 ईसा पूर्व
बृहद्रथ मौर्य 187 ईसा पूर्व- 185 ईसा पूर्व

 

मौर्य राजवंश की सैन्य व्यवस्था कैसी थी ?


मौर्य साम्राज्य के शासनकाल में ही संपूर्ण भारतवर्ष में राष्ट्रीय राजनीतिक एकता की स्थापना की गई थी. मौर्य वंश के शासन काल में सत्ता का सुदृढ़ रूप से केंद्रीकरण किया गया था, लेकिन उस दौरान किसी भी राजा को किसी भी प्रकार का अंकुश का प्रावधान नहीं लगा था. मौर्य वंश के शासनकाल में ही गणतंत्र का हादसा हुआ और इसके तुरंत बाद राजतंत्रात्मक व्यवस्था सुदृढ़ से सुसज्जित हुई थी. 

चंद्रगुप्त के शासनकाल में ही आचार्य कौटिल्य ने राज्य सप्तांग सिद्धांत निर्धारित किया , इसी के आधारभूत पर मौर्य प्रशासन और उसकी गृह तथा विदेशी नीति संचालित होने लगी थी. चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने सैन्य व्यवस्था को 6 समितियों में विभाजित किया था. प्रत्येक सैनी समिति में 5 सैन्य विशेषज्ञ मौजूद होते थे. 

सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के सैन्य व्यवस्था में पैदल सेना, अश्व सेना, गज सेना, रथ सेना तथा नौसेना भी मौजूद थी. मौर्य वंश की प्रत्येक सेना का सर्वोच्च अधिकारी अन्तपालकहलाता था. सम्राट चंद्रगुप्त की सेना में मेगास्थनीज के अनुसार 6,00000 पैदल 50,000 अवरोही 9000 हाथी तथा 800 रथों वाले सैनिक मौजूद थे.



मौर्य वंश का प्रांतीय प्रशासन कैसा था ?


सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने प्रांतीय प्रशासन को बेहतर रूप से संचालित करने के लिए मौर्य साम्राज्य को चार प्रांत में विभाजित कर दिया था, जिन्हें “चक्र” के नाम से जाना जाता था. इन सभी प्रांतों को सम्राट स्वयं प्रतिनिधि करते थे और इनका संचालन भी सम्राट के द्वारा ही किया जाता था. मौर्य प्रशासन में प्रांतों की संख्या 5 तक बढ़ गई थी.

मौर्य वंश का नगर प्रशासन कैसा था ?


मौर्य साम्राज्य की नगरीय प्रशासन मेगास्थनीज के अनुसार 6 समितियों में विभाजित थी. यह 6 समितियां निम्नलिखित हैं.

1. प्रथम समिति- उद्योग शिल्पों का निरीक्षण करता था।

2 . द्वितीय समिति- विदेशियों की देखरेख करता है।

3 . तृतीय समिति- जनगणना।

4 . चतुर्थ समिति- व्यापार वाणिज्य की व्यवस्था।

5 . पंचम समिति- विक्रय की व्यवस्था, निरीक्षण।

6 . षष्ठ समिति- बिक्री कर व्यवस्था। 

मौर्य वंश का पतन कैसे हुआ ?


ज्यादातर मौर्य वंश का पतन का कारण सम्राट अशोक के बाद आए हुए अयोग्य उत्तराधिकारी थे. 185 ईसा पूर्व मौर्य वंश के सेनापति ने अपने सम्राट की हत्या कर दी और उसी जगह से शंगु वंश का नया राजवंश आरंभ हुआ था.
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