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Maharana Pratap (महाराणा प्रताप का जीवन परिचय)

Maharana-Pratap

Maharana Pratap (महाराणा प्रताप) का जीवन परिचय

हमेशा से ही हमारा भारत देश महापुरुषों का देश कहा जाता है। भारत देश में अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिनकी वीरता की कथाओं से भारत देश की भूमि गौरवान्वित है। इतना ही नहीं बल्कि इन महापुरुषों के नाम से हमारे भारत देश का इतिहास गुंजायमान है। इन्हीं वीर महापुरुषों में से एक महापुरुष हैं महाराणा प्रताप, जिन्होंने अपनी वीरता, साहस और पराक्रम से भारत देश का नाम रोशन ही नहीं किया बल्कि अपना नाम भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिख कर अमर कर दिया।
तो आइए हमारे इस महान महापुरुष महाराणा प्रताप जी के जीवन के विषय में विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त करते हैं।

Maharana Pratap का संक्षिप्त जीवन परिचय (Brief Introduction):

नाम – महाराणा प्रताप सिंह
उपनाम – प्रताप सिंह
जन्म – 9 मई 1540 ई०
जन्मस्थान – कुम्भलगढ़ दुर्ग, मेवाड़, राजस्थान, भारत
पिता का नाम – उदय सिंह
माता का नाम – महारानी जयंताबाई
शासनकाल – 1568 – 1597
पत्नी का नाम – महारानी अजबदे पुनवार ( अन्य 10 रानियाँ )
पुत्र – अमर सिंह
उत्तराधिकारी – अमर सिंह
राजसी महल – सिसोदिया
संतानें – 17 पुत्र और 5 पुत्रियाँ
प्रिय घोड़ा – चेतक
धर्म – हिन्दू
मृत्यु – 19 जनवरी 1597 (उम्र 56 साल)
मृत्यु स्थान – चांवड

Maharana Pratap का प्रारम्भिक जीवन (Early Life):

Maharana Pratap ( महाराणा प्रताप ) जी का नाम भारत के इतिहास में उनकी वीरता, साहस व दृढ़ता के लिए अमर है। महाराणा प्रताप राजपूत वंश में जन्मे थे। उनका जन्म 5 मई 1540 को राजस्थान के मेवाड़ राज्य के कुम्भलगढ़ दुर्ग में महाराणा उदय सिंह व रानी जयंताबाई के घर हुआ था। महाराणा प्रताप अपनी बाल्यावस्था से ही अत्यंत वीर और साहसी थे। महाराणा प्रताप सिंह को राजपूत वीरता, दृढ़ता व शिष्टता की मिसाल कहा जाता है। राणा सांगा जी के पोते व उदय सिंह के पुत्र होने के कारण बचपन से ही आजादी व वीरता के लिए ज्वाला महाराणा प्रताप के हृदय में प्रज्वलित थी।

महाराणा प्रताप की माता जयंताबाई, पाली के सोनगरा अखैराज की पुत्री थीं। बचपन से ही लोग महाराणा प्रताप को कीका के नाम से पुकारते थे। इसके अलावा महारानी जयंताबाई के अतिरिक्त महाराजा उदय सिंह की और भी रानियाँ थीं, परन्तु महाराजा उदय सिंह की सबसे प्रिय रानी धीर बाई थीं। इस कारणवश रानी धीर बाई के प्रस्ताव अनुसार राणा उदय सिंह चाहते थे कि रानी धीर बाई का पुत्र जगमल सिंह, राणा उदय सिंह का आने वाला उत्तराधिकारी हो।
इसके अतिरिक्त राणा उदय सिंह को अन्य राशियों से दो पुत्र शक्ति सिंह व सागर सिंह थे। परन्तु चित्तौड़ की प्रजा महाराणा प्रताप की वीरता व साहस के कारण उन्हें ही अपने बनने वाले सम्राट के रूप में देखती थी। इसी कारणवश अन्य तीनों भाई महाराणा प्रताप से घृणा करते थे।

Maharana Pratap (महाराणा प्रताप) का व्यक्तिगत जीवन :

महाराणा प्रताप की महारानी अजब्दे पुनवार, नामदे राम राव पुनवार की पुत्री थी। वह स्वभाव से अत्यंत शान्त व सुशील थी। महारानी अजब्दे पुनवार बिजौली की राजकुमारी थीं, जो कि चित्तौड़ के आधीन था। उस वक्त बाल विवाह की प्रथा प्रचलित थी, अतः महाराणा प्रताप की मां व रानी अजब्दे की मां ने इन दोनों का विवाह करने का निश्चय लिया। अजब्दे पुनवार महाराणा प्रताप की पहली रानी थीं। इसके अतिरिक्त उनकी 10 रानियाँ , 17 पुत्र व 5 पुत्रियाँ थीं।

Maharana Pratap (महाराणा प्रताप) की 11 रानियों के नाम :

महारानी अजब्दे पुनवार , अम्बाई राठौर , रत्नावती बाई परमार , जसोबाई चौहान , फूल बाई राठौर , शाहमती बाई हाड़ा , चम्पाबाई झाती , आशा बाई खीचर , आल्मदे बाई चौहान , लखाबाई , सोलानि्खनपुर बाई।
महाराणा प्रताप के 17 पुत्रों के नाम :
अमर सिंह , भगवन दास , शेख सिंह , कुंवर दुर्जन सिंह , कुंवर राम सिंह , कुंवर रैभाना सिंह , चंदा सिंह , कुंवर हाथी सिंह , कुंवर नाथा सिंह , कुंवर कचरा सिंह , कुंवर कल्यान दास , सहस माल , कुंवर जसवंत सिंह , कुंवर पूरन माल , कुंवर गोपाल , कुंवर सनवाल दास सिंह , कुंवर माल सिंह।

Maharana Pratap का राज्याभिषेक व शासनकाल :

महाराजा उदय सिंह का अपनी समस्त रानियों में से एक रानी धीर बाई से सर्वाधिक प्रेम होने के कारण, रानी धीर बाई की इच्छानुसार उनके पुत्र जगमल सिंह को, महाराणा प्रताप के स्थान पर राजगद्दी सौंप देने के लिए वीरयता प्रदान करना, तथा अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देना ही प्रजा में क्रोध और निराशा का कारण बना।
जगमल ने राज्य का शासन मिलते ही प्रजा पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। जिसके कारण राजपूत सरदारों ने जगमल सिंह को राजगद्दी से हटा कर 1628 फाल्गुन शुक्ल 15 यानि 1 मार्च 1576 को महाराणा प्रताप को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया। महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुंदा में हुआ था। महाराणा प्रताप ने उदयपुर को अपनी राजधानी बनाया तथा 1568 से 1597 तक उन्होंने शासन किया। उदयपुर पर यवनों के आसानी से आक्रमण कर सकने की वजह से महाराणा प्रताप ने उदयपुर छोड़कर कुम्भलगढ़ और गोगुंदा पहाडियों के इलाकों को अपना केन्द्र बनाया।

मुगलों का चित्तौड़ पर आक्रमण :

अजमेर का शासक मुगल सम्राट अकबर निसन्देह बहुत ही महत्वाकांक्षी शासक था, उसने सम्पूर्ण भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित करने का विशाल स्वप्न देखा था। वह चाहता था कि इस्लामिक परचम सम्पूर्ण हिन्दुस्तान में फहरे, इसके लिए उसने साम, दाम, दंड, भेद सभी का सहारा लिया। महाराणा प्रताप के शासनकाल में दिल्ली में मुगल सम्राट अकबर का शासन था। मुगल सम्राट अकबर ने मेवाड़ पर कई बार आक्रमण किया परन्तु महाराणा प्रताप को नहीं झुका सका। हालांकि उसकी क्रूरता के आगे कई राजपूत राजाओं ने अपने सर झुका लिए परन्तु महाराणा प्रताप ने मुगलों को हमेशा युद्ध में हराया। 1572 में मेवाड़ के सिंहासन को सम्भालते हुए उन्होंने मुगल सेना से युद्ध के दौरान अपने अद्भुत साहस से विपत्ति का सामना किया।

अकबर का सन्धि प्रस्ताव :

महाराणा प्रताप से लगातार युद्ध में पराजित होने के बाद अकबर ने अपनी युक्ति लगाई व महाराणा प्रताप को प्रस्ताव भेजा कि अगर वे उसकी सियासत को स्वीकार करते हैं तो हिन्दुस्तान का आधा हिस्सा महाराणा प्रताप का हो जाएगा परन्तु महाराणा प्रताप ने अकबर के इस प्रस्ताव को नहीं माना। जब अकबर अपनी कूटनीतियों व समस्त प्रयासों के पश्चात् भी महाराणा प्रताप को न झुका सका तब उसने आमेर के राजा भगवानदास के भतीजे कुंवर मानसिंह जो कि अकबर का साला था, को उदयपुर के शासकों को आधीनता स्वीकार करने हेतु समझाने भेजा। मानसिंह महाराणा प्रताप को समझाने उदयपुर आए, उन्होंने महाराणा प्रताप को अकबर से सन्धि कर लेने का सुझाव दिया, परन्तु महाराणा प्रताप ने यह सन्धि प्रस्ताव भी अस्वीकार करते हुए अपनी स्वाधीनता बनाए रखने व युद्ध में सामना करने की घोषणा कर दी।

हल्दी घाटी का युद्ध :

मानसिंह, उदयपुर से खाली हाथ अकबर के पास लौटे, तो बादशाह अकबर ने इसे अपनी तौहीन व करारी हार के रूप में लिया, उधर महाराणा प्रताप का भाई जगमल सिंह भी अकबर से आकर मिल गया जिसकी सहायता से मुगलों ने राजपूतों के धन, अन्न आदि को पूर्ण रुप से क्षतिग्रस्त कर महाराणा प्रताप को युद्ध के लिए ललकारा। मुगलों व राजपूतों का यह युद्ध हल्दी घाटी के मैदान में हुआ। हल्दी घाटी का यह युद्ध भारत के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध था, इसमें कई राजपूत राजाओं ने महाराणा प्रताप का साथ छोड़कर अकबर के सामने हार मान ली और उसके शरणागत हो गए।

लेकिन महाराणा प्रताप अकेले ही अपने कुछ सैनिकों के साथ यह युद्ध लड़ते रहे। मानसिंह ने अपने 5000 सैनिकों सहित अकबर की तरफ से नेतृत्व किया, हल्दी घाटी का यह युद्ध कई दिनों तक चलता रहा। प्रताप की प्रजा को मेवाड़ के किले में सुरक्षित रखा गया, परन्तु अन्न जल के अभाव के कारण महिलाओं व बच्चों का बुरा हाल था। इसके बावजूद भी मेवाड़ की प्रजा ने इस युद्ध में महाराणा प्रताप का भरपूर साथ दिया। परन्तु अन्न जल के अभाव के कारण राजपूत सैनिकों की दशा भी दयनीय हो गई और अन्ततः प्रताप युद्ध हार गए। उधर राजपूतों की प्रथा के अनुसार सभी राजपूत स्त्रियों ने जौहर कर स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया।

परन्तु महाराणा प्रताप ने स्वयं को अकबर के आधीन नहीं किया व मेवाड़ को पुनः हासिल करने की आस लिए हुए युद्ध के कई दिनों बाद तक जंगल में जीवन व्यतीत किया।

प्रिय घोड़ा चेतक :

चेतक महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम था, जो उन्हें सबसे ज्यादा प्यारा था। चेतक बहुत ही समझदार व साहसी घोड़ा था। हल्दी घाटी के युद्ध में चेतक ने घायल होने के बाद भी 26 फुट गहरे दरिया में कूदकर प्रताप को पार पहुंचाया इस तरह महाराणा प्रताप के प्राणों की रक्षा करते हुए चेतक ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। हल्दी घाटी में चेतक का मंदिर आज भी विद्यमान है।

Maharana Pratap (महाराणा प्रताप) की मृत्यु :

इतिहास में ऐसा कहा गया है कि महाराणा प्रताप की मृत्यु की सूचना मिलने पर मुगल सम्राट अकबर भी स्तब्द्ध रह गया था। वह स्वयं महाराणा प्रताप की वीरता, दृढ़ता व स्वाभिमान का कायल हो गया था। कहते हैं कि जंगलों में शिकार के दौरान लगने वाली चोटों के कारण प्रताप गम्भीर रूप से घायल हो गए थे, जिसकी वजह से 19 जनवरी 1597 को चांवड में उन्होंने अपनी अन्तिम सांस ली।

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