Poetry

Maa ( माँ )

Maa ( माँ ) कविता | माँ के लिए कविता
Written by Abhilash kumar

माँ, माते, माताश्री
ये सभी हैं जननी के नाम…
कोई नहीं ले सकता जग में
एक माँ का स्थान…

माँ तो ऐसी मूरत है
जिसमें होता कोई दाग नहीं..
एक सच्ची बात बताता हूँ
ये है कोई बकवास नहीं…

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जनम हुआ मेरा दिल्ली में
प्रारम्भिक शिक्षा वहीँ हुई…
डेढ़ साल का था मैं जब
एक घटना मेरे साथ हुई…

मैं तो छत पर खेल रहा था
माँ थी नीचे कमरे में…
तीन मंजिले से जाकर मैं
नीचे गिरा बगीचे में…

सुनते ही इस घटना को माँ
सुध बुध खो हो गई बेहोश…
तीन दिन तक अस्पताल में
मुझको भी ना आया होश…

पर माँ को ये आशा थी की
मुझे नहीं कुछ हो सकता है…
माँ की आशा के आगे
भगवान भी तो झुकता है…

भूल गया तेरी हर बात को

प्यारी लगती थी जब मेरी
नादानी पर हँसती थी…
कभी कभी मेरी गलती पर
खुद ही रोने लगती थी….

जिददी तो मैं इतना था
पापा से पिटता रोज़ाना..
कभी शिकायत करती थी माँ
पर सदा उसी ने ही थामा…

पर मुझको क्या मालूम था की
एक दिन ऐसा आएगा…
उस माँ का हाथ सर से
सदा के लिए उठ जायेगा..

ना हो ऐसा साथ किसी के
जैसा मेरे साथ हुआ..
माँ के बिन जीवन में जैसे
केवल अन्धकार हुआ !!

पास नहीं है आज वो मेरे
पर साथ हमेशा मेरे है…
माँ के आशीर्वाद से ही तो रौशन हुए सवेरे हैं…
माँ के आशीर्वाद से ही तो रौशन हुए सवेरे हैं…!!!

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Abhilash kumar

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