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अकर्म ही पाप है

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आज के Blog की शुरुआत हम भगवत गीता के एक श्लोक से करेंगे तथा इसका मतलब समझने के बाद इसको वर्तमान से जोड़ेंगे तथा इस से कुछ सीखने की कोशिश करेंगे ! आज के ब्लॉग का Topic है अकर्म ही पाप है! इस ब्लॉग को पूरा पढ़ने पर आपको जरूर कुछ न कुछ सीख मिलेगी !

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन !

मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि !!

KARMANYEVADHIKARASTE MA PHALESU KADACHAN !

MA KARMA-PHALA-HETURBHURMA TE SANGOSTVAKARMANI !!

अर्थात :- प्रत्तेक व्यक्ति का जो कर्तव्ये या कर्म होता है उसे उसको पूरा करना चाहिए और अपने कर्मो के फल के विषय में नहीं सोचना चाहिए और न ही अपने आपको अपने कर्मो का दोषी मानना चाहिए और न ही कभी कर्म करने से घबराना चाहिए !

भगवतगीता के इस श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते है कि प्रत्येक मनुष्य का अपना अपना कर्म या कर्त्तव्य होता है जिसको उसे पूरा करना चाहिए परन्तु मनुष्य कर्म न करके उसके परिणामों के विषय में सबसे पहले सोचने लगता है! जिसके कारण मनुष्य कुछ नहीं कर पाता है! और आपनआ समय सिर्फ सोचने में हो व्यर्थ करता है जिसके कारण बाद में उसको पछताना पडता है !

ये श्लोक वर्तमान समय में भी बिल्कुल सटीक बैठता है क्यूंकि वर्तमान समय में मनुष्य फलो के बारे में सबसे पहले सोचता है तथा कर्म नहीं करता है! उदाहरण के लिए मनुष्य कोई भी उद्योग लगाने से पहले या कोई भी बडा कदम उठाने से पहले उसके परिणामो के बारे में हज़ार बार सोच लेता है कि वो काम किया जाए या नहीं चाहे वो काम कितना भी अच्छा क्यों न हो , लेकिन जब तक व्यक्ति को नहीं लगता है कि उसका कोई परिणाम निकलेगा या मन मुताबिक फल नहीं मिलेंगे तब तक मनुष्य उस काम को नहीं करता है !

आज के आधुनिक समय में मनुष्य ने आपने दिल का इस्तेमाल करना छोड़ दिया है क्यूंकि दिल सोचता नहीं है बस बोलता है कि ये अच्छा लगता है तो कर डाल ! (अच्छे काम कि बात कि जा रही है )लेकिन दिमाग ही है जो उसके परिणामो के विषय में सोचने लगता है ! भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध भूमि में समझाते है कि इस समय आपका कर्तव्य युद्ध भूमि में युद्ध लड़ना है और अगर तुम आपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करते हो या युद्ध नहीं लड़ते हो या मैदान छोड़ कर चले जाते हो तो वह एक पाप के सामान है अर्थात अकर्म ही पाप है !

धन्यवाद आशा करते है की आपको ये Blog पसंद आया होगा……..

 

 

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